19 जनवरी, 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
Business Desk: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को केंद्रीय बजट 2026 पेश करने जा रही हैं। इस बार बजट से सबसे बड़ी उम्मीद रोजगार सृजन को लेकर है। भारत इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां कामकाजी उम्र की आबादी आश्रित वर्ग से अधिक है—यानी देश के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड है। लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या इस आबादी को स्थिर, उत्पादक और सम्मानजनक नौकरियों में बदला जा सकता है।
आज भारत के विकास सपनों, 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य और वैश्विक ताकत बनने की महत्वाकांक्षा का सीधा संबंध इस बात से है कि देश अपने करोड़ों युवाओं को रोजगार दे पाता है या नहीं। यही वजह है कि बजट 2026 में रोजगार सिर्फ सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक प्राथमिकता बन चुका है।
रोजगार क्यों बन गया सबसे अहम मुद्दा?
वैश्विक निवेश, सप्लाई चेन में भागीदारी और औद्योगिक विस्तार उन्हीं देशों में संभव है, जहां कुशल और बड़ी श्रमशक्ति उपलब्ध हो। अगर भारत अपनी जनसंख्या बढ़त को मैन्युफैक्चरिंग, स्किल डेवलपमेंट और लेबर रिफॉर्म्स के जरिए वास्तविक आजीविका में बदल पाता है, तो वह न सिर्फ घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अपना प्रभाव बढ़ाएगा।
बजट 2026 के सामने असली चुनौती
हालांकि यह रास्ता आसान नहीं है। मॉर्गन स्टेनली के मुताबिक, बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए भारत को हर साल लगभग 12.2% की असाधारण आर्थिक वृद्धि चाहिए। अगर युवाओं को उत्पादक काम नहीं मिला, तो सामाजिक असंतोष बढ़ने और 2047 के विकसित भारत लक्ष्य के चूकने का खतरा बना रहेगा।
सरकार इस चुनौती से अवगत है। चार नए लेबर कोड्स, जिन्हें 2020 में मंजूरी मिली थी, अब लागू होने की कगार पर हैं। इन कानूनों का उद्देश्य कंपनियों के लिए रोजगार सृजन को आसान बनाना और कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी व सामाजिक सुरक्षा देना है। बजट 2026 यह तय करेगा कि सरकार इस दिशा में कितना आगे बढ़ती है।
लेबर लॉ और बजट से उम्मीदें
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2026 लेबर मार्केट को नई दिशा दे सकता है। 1 अप्रैल 2026 से लेबर कोड्स के पूरी तरह लागू होने की संभावना है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, इन सुधारों से 77 लाख नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं और मध्यम अवधि में बेरोजगारी दर में 13% तक कमी आ सकती है।
हालांकि राजनीतिक विरोध और ट्रेड यूनियनों की चिंताओं के चलते इन सुधारों में देरी हुई है, लेकिन बदलते वैश्विक हालात और भारत की रणनीतिक स्थिति अब तेज फैसलों की मांग कर रही है।
मैन्युफैक्चरिंग बन सकता है रोजगार का इंजन
भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि उत्साहजनक रही है, लेकिन आने वाले दशक में वर्कफोर्स में शामिल होने वाले 8.4 करोड़ लोगों के लिए यह पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि एडवांस मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और स्किल निवेश के बिना रोजगार संकट गहराता जाएगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। PLI स्कीम के जरिए पिछले पांच वर्षों में इस सेक्टर ने 13 लाख से ज्यादा नौकरियां पैदा कीं और स्मार्टफोन निर्यात में ऐतिहासिक उछाल आया। अकेले मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने FY25 में श्रमिकों को करीब 25,000 करोड़ रुपये वेतन के रूप में दिए।
भविष्य की नौकरियां: सेमीकंडक्टर और हाई-टेक सेक्टर
भारत अब सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ रहा है। 2026 से कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने की उम्मीद है, जिससे चिप डिजाइन, असेंबली, टेस्टिंग और सप्लाई चेन में लाखों कुशल नौकरियों की मांग पैदा होगी। अनुमान है कि 2026 के अंत तक 10 लाख स्किल्ड प्रोफेशनल्स की जरूरत पड़ेगी।
सबसे बड़ी बाधा: स्किल गैप
इतनी संभावनाओं के बावजूद सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है—कौशल की कमी। भारत के ITI और वोकेशनल ट्रेनिंग सिस्टम उद्योग की जरूरतों से मेल नहीं खाते। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ITI से प्रशिक्षित युवाओं में से 0.1% से भी कम को स्थायी नौकरी मिल पाती है।
रिक्रूटमेंट एजेंसियों के अनुसार, भारत में चार में से तीन नियोक्ता कुशल टैलेंट की कमी से जूझ रहे हैं, जबकि आईटी और डेटा स्किल्स की मांग चीन और सिंगापुर से भी ज्यादा है।

























